मैं अाभारी हूं भारत के गणमान्य साहित्कारों स्वर्गीय निर्मल वर्मा जी अौर श्री गिरिराज किशोर जी का जिन्होंनें मुझे प्रेरित किया डायरी लिखने को।
अाज से तकरीबन पांच साल पहले तक की बात है, मैं भारत के साहित्यिक अौर सामाजिक क्षेत्र के लोगों को हाथ से 10-20-30 या इससे भी अधिक पेजों के लंबे पत्र हाथ से लिखा करता था।    मैं उस दिन फूला नही समाया था जिस दिन मुझे निर्मल वर्मा जी के हाथ से लिखा दो पेज का पत्र मिला था, जिसमें उन्होनें मुझसे कहा था कि मुझे अपने अनुभवों को डायरी के रूप में लिखना चाहिये  भविष्य में चिंतन को विचारशीलता को समझ को परिष्कृत करने में डायरी बहुत ही अधिक उपयोगी होगी।  मैंने निर्मल जी बहुत किताबें पढ़ी थीं किंतु जिस दिन मैंने उनकी किताब “शताब्दी के ढलते वर्षों में” पढ़ी थी मैंने उनको अपना मार्गदर्शक मान लिया  अौर जीवन पर्यंत मानता रहूंगा।

अादरणीय गिरिराज किशोर जी की एक किताब है “पहला गिरमिटिया”  जो उन्होनें फूलबाग में बहुत ही प्यार से मैगसेसे पुरस्कृत डा० संदीप पाण्डे जी को भेंट की थी।   मैं उन दिनों संदीप जी के साथ कई कई दिनों तक साथ रहा करता था, मैं जानता था कि संदीप जी किताबें नहीं पढ़ते हैं, किंतु मैंने सोचा कि शायद कम से कम गिरिराज जी की किताब ये पढ़ेंगें किंतु जब इन्होनें लंबे समय तक उस किताब को छुअा तक नहीं तो मैंने उनसे उधार मांगी अौर उसी दिन पूरी किताब पढ़ डाली, मेरे मन में बेईमानी का भाव अाया मैंने सोचा कि संदीप जी तो किताब विताब पढ़ते नहीं हैं इसलिये क्यों ना यह किताब रख ली जाये।  मैंने रख ली, मेरे दुर्भाग्य से हुया यूं कि एक दिन गिरिराज जी ने इनसे पूंछ लिया कि अापको किताब कैसी लगी तब संदीप जी को ध्यान अाया कि इनको एक किताब मिली थी जो कि मैंने उधार मांगी थी,  मुझे कुछ महीने में ही वह किताब वापस करनी पड़ी, मैं अाज तक नहीं जानता कि संदीप जी ने वह किताब कभी सच में ही ध्यान से पढ़ी है या………।  तो मैंने जब से गिरिराज जी की वह किताब पढ़ी मैं मन ही मन इनका मुरीद हो गया।  चूंकि गिरिराज जी की एक अादत है कि वे जिसको भी समाज के लिये कुछ करता देखते हैं उसके साथ अपनी सहानुभुति जोड़ लेते हैं, इसलिये समय के साथ कुछ ऐसा हुअा कि मेरे संबंध भी उनके साथ बने अौर एक दिन वर्ष 2005 में उन्होंने मुझसे कहा चूंकि मैं भारत में सामाजिक कार्यों से घूमता रहता हूं इसलिये मुझे डायरी लिखनी चाहिये अपने अनुभवों को परिष्कृत करना चाहिये अपने भीतर के उन परिवर्तनों की दिशायें देखनी चाहिये जो कि समझ अौर अनुभवों के परिष्करण से होते रहते हैं।

एक लंबा समय लगा डायरी को लिखना शुरू करना है इस प्रकार का मन पक्का करने में। चूंकि हर पल को क्रम से अौर व्यवस्थित रूप में याद करना मुमकिन नहीं इसलिये जो भी पुरानी यादें हैं वे मुझे ज्यों ज्यों याद अाती जायेंगी मैं अापके साथ बांटता चलूंगा।   चूंकि मैं भारत के दबे कुचले लोगों के विकास के लिये, सशक्तिकरण के लिये, मानवाधिकारों के लिये, वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना के लिये, सामाजिक मूल्यों के लिये, समाज की वास्तविक स्वतंत्रता के मूल्यों के लिये जितनी मेरी समझ विकसित होती जाती है उतनी परिपक्वता से पूरी इमानदारी अौर प्रतिबद्धता के साथ काम करते रहने का प्रयास करता रहता हूं,  इसलिये मेरी डायरी का केंद्र भारतीय समाज से जुड़े जमीनी मुद्दे ही होगें।

मैं अपने अनुभवों को इसलिये बाँटना चाहता हूँ क्योकि शायद मेरे अनुभव मेरे भारतीय समाज के उन हजारों-लाखों समाज-सक्रिय साथियों का अात्मविश्वास बनाये रखने में सहयोगी हो सकें जिनको मीडिया खबरें नहीं बनाता है क्योंकि मीडिया को चलाने वाले लोग उनके अपने रिश्तेदार नहीं हैं या उनके साथ पढ़े हुये नहीं हैं या उनके अपने अभिजात्य वर्ग के नही हैं या जिनको विदेशों से अनाप शनाप फंड नही अाता है या जिनके पास इस प्रकार के अार्थिक अौर अभिजात्यीय वर्ग के लोगों के साथ संबंध रूपी मानवीय संसाधन नहीं हैं कि वे विभिन्न प्रकार के विदेशी अौर देशी पुरस्कारों को पाने की सेटिंग बैठा सकें या किसी IIT या किसी विदेशी संस्थान के नहीं पढ़े हैं।